जो उस दौर में उसके उच्छवास होते हैं वो कभी कविता में ,कभी ग़ज़ल में ,तो कभी रुबाइयों में दृश्यगत होते है .ऐसी ही घटना को जीते हुए मैंने जो अनुभूतियाँ पाई उसी की अभिव्यक्ति अधोलिखित मेरी रचना है-
दूर क्षितिज के पार कोई है-
अंतर-गर्तों के पार कोई है-
मन -चपला के पार कोई है-
शून्य -स्वर्ग के पार कोई है!
जो रोज बुलावा देता है,
आने का छलावा देता है,
टूटे मन के अदृश्य डोर को
निर्टूट सहारा देता है ।
मन- सतरंगे के रंगों को
उल्लास -प्रफुल्ल पुलकित अंगों को-
साँसों की झीनी चादर को -
कोई रंग अजूबा देता है!
जो रोज बुलावा ........
आने का ...........
करुणा, कसक ,हया ,दया को-
आशा,अभिलाषा,हर्ष,अमर्ष को,
प्रत्यंचा पर चढ़ी मौत को-
राह अलग कोई देता है.
जो रोज ......
आने का .....
प्रवाहमान अविरल सांसों को-
तिमिराभूत इच्छित -आसों को-
थकी नसों में सुप्त लहू को-
रंग सुर्ख-सा कोई देता है!
जो रोज ....
आने का....
मर्म -कथ्य को मन में रख,
कर्म -कथ्य को विस्मृत कर,
आर्त्त- पुकार की मौन व्यथा को-
कन्धों का सहारा देता है
जो रोज....
आने का .....