Tuesday, August 3, 2010

ईश्वर

सुविधाओं का बा़जार, विश्वास बिकता है,
दुशवारिओं का मज़ार, ग़म पिघलता है ।

हर इच्छा इक आकार लेती है,
अनिच्छएँ निराकार हो जाती हैं,
विद्रोह करना हमारी आदत है
दर्द में तड़पना ही इबादत है।

हर जीत तो हमारी है,
पर हार की भागीदारी नहीं,
बजी सुरीली तो मैंने बजाई है,
बेसुरी हो तो बाँसुरी तुम्हारी है।

चित्त भी उसी का,पट्ट भी उसी का है,
गगन भी,चमन भी,कायनात भी उसी का है,
मोह भी,भोग भी,निर्वाण भी उसी का है,
तेरा क्या? उसका क्या? जब तू ही उसी का है ।

खुश होकर मचल ले,वो देखता है,
रो-रोकर दहक ले,वो देखता है,
स्वयं को ठग कर इतरा, वो देखता है,
ना देखता तो तू खुद को, वो देखता है।

विभ्रम में जीना अच्छा लगता है,
सपने पाल के रखना अच्छा लगता है,
वो तो कोई नहीं इक बहाना है,
बहाने भी पाल के रखना अच्छा लगता है।

विनय कुमार उपाध्याय


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