Sunday, September 5, 2010

खुदा

हर ज़िल्लत, हर फ़ाकाक़शी का ग़वाह रहा वो
हर मन्ऩत, हर तिज़ारत का चश्मदीद रहा वो,

अपने
मतलब के तरीक़े बुत गढ़ लिए उसका,
जब
जी में आया तो सज़दा किया उसका.

अपने तस्सबुर की राहों का हमसफ़र बना लिया,
रास उसका साथ तो खुद दश्त--दफ़्न कर दिया.

है
वो कौन? रह्ता कहाँ? पता नहीं यारों
है
दिल के क़रीब, याँ वा वहाँ जाना नहीं यारो.

जब भी कोई फ़रियाद ले पहुँचा हूँ उसके पास
कुछ कहता वो,उसकी आँखें करती हैं पूरी आस.

चिढ़
के समय की तल्खियों से हो जाता हूँ बदजुबान
वो
है तो बे ग़म अरसे से हमें करता है बे जुबान.

जब भी थूका मंसूबों को अंबर पे, गिरता अपने सर
जब भी टूटो,हाथ उठा देखो उसे आँखों भर.

विनय
कुमार उपाध्याय

2 comments:

  1. बहुत खूब...किसी शायर ने ठीक ही कहा है.......

    किसने जाना है बदलते हुए मौसम का मिजाज़,
    उसको चाहो तो समझ पाओगे फ़ितरत उसकी.

    ReplyDelete
  2. 'ज़फर' ने ठीक ही फ़रमाया था
    'ज़फर' आपको ढूँढ मत ढूँढ उसको
    वो तुझमे है जिसकी तुझे ज़ुस्त-ज़ू है

    साधुवाद राघवेन्द्र जी

    ReplyDelete